Posted by: Devi Nangrani | March 21, 2011

ख़बर का ढांचा

Ghoush Pirzado

ख़बर का ढांचा :  गौष पीरज़ादा

आज के मीडिया की तरक्की के इस दौर में ख़बर की अहमियत पहले के मुक़ाबले में बहुत ज़्यादा बढ़कर सामने आई है। समाज का हर फर्द (व्यक्ति) हर वक़्त एक अहम ख़बर के इंतज़ार में अपनी आंखें और कान हर वक़्त टीवी की लगाए नज़र आता है। जैसे-जैसे इलेक्ट्रॉमिक मीडिया तरक्की की मंज़िलें तय करते हुए आकाश की तरफ बढ़ रही है, वैसे-वैसे आज का इंसान ख़बर के साथ जुड़ता जा रहा है।

मिसाल के तौर पर माईकल जैक्सन की मौत की ख़बर ने अचानक लोगों को चौंका दिया, और वो दुख की कैफ़ियत से दो-चार हो गए। माइकल जैक्सन दिल के दौरे में इंतक़ाल कर गए। ख़बर की पुर-इसरारियत से जैसे ही वो निकले तो उनके ज़ेहनों में एक सवाल ने जन्म लिया कि आख़िरकार इतने बड़े कलाकार की मौत अचानक कैसे हो गई। मगर जितना जल्दी यह सवाल लोगों के ज़ेहनों में आया, उतना ही जल्दी यह खबर मीडिया के उपर नश्र हो गई कि जैक्सन  अचानक मौत की तहकीकात कराई जा रही है। और फिर पोस्टमार्टम रिपोर्ट के हवाले से यह ख़बर भी मीडिया में आ गई कि उनके मेदे (आमाशय) में दो टैबलेट पाए गए हैं और जिस्म पर गहरे निशान भी देखे गए हैं, सर के बाल गिर चुके थे, वगैरह-वगैरह।

अग्रलिखित बातों से यह बात सामने आ गई कि इस ख़बर को लोगों ने सुना भी और मालुमात भी हासिल किए। यह हक़क़त है कि दुनिया जैसे-जैसे तरक्की की मंज़िले तय करती जाएगी, ख़बर की अहमियत और भी बढ़ती चली जाएगी। ख़बर की अहमियत को देखते हुए और उस खबर को लोगों तक पहुंचाने के लिए निम्नलिखित बातों को मद्दे-नज़र रखना ज़रुरी होता है:- 

ख़बर का सच होना:-  

सबसे पहले यह बात तो तय है कि किसी ख़बर का सच होना बहुत ज़रुरी है। जिसके लिए ज़रुरी है कि रिपोर्टर गहराई में तस्दीक (जांच-पड़ताल) करें और फिर बाद में इसको मंज़र-ए-आम पर लाए। ख़बर के पीछे जाकर असल हक़ीक़त जाने बग़ैर अगर ख़बर मार्केट में चली गई और कल अगर झूठी साबित हुई तो पढ़ने वाले के पास वो अख़बार आमतौर पर और रिपोर्टर ख़ासतौर पर झूठा तसव्वर किया जाएगा। इसलिए ख़बर का सच होना सबसे अहम बात है।

ख़बर चौंका देने वाली हो:-

कुत्ते ने आदमी को काट लिया, ये ख़बर नहीं है, बल्कि आदमी ने कुत्ते को काट लिया, ये बड़ी ख़बर है। जैसे हमारे समाज में कत्ल व ग़ारत तो एक मामूल बन गया है। आए दिन कत्ल व डकैती होना कोई नई बात नहीं है। मगर जब कोई कत्ल का वाक़्या होता है तो बतौर सहाफी हमें वो वाक़्या रिकॉर्ड पर लाना चाहिए। क़त्ल की वो ख़बर बड़ी बन जाएगी, जब एक बेटा अपनी ही मां को बदकारी के इलज़ाम में क़त्ल कर देता है, या वो ख़बर बड़ी बन जाएगी जब एक शौहर अपनी बीवी से नाराज़ होकर अपने नौनिहाल बच्चे का क़त्ल कर दे। ऐसी ख़बरों को जल्द से जल्द लोगों कर पहुंचाना एक सहाफी की ज़िम्मेदारी है।

लफ़्फ़ाज़ी से पाक ख़बर:-

ख़बर और अफ़साने में फर्क़ ही यही होता है कि अफ़साने में अल्फ़ाज़ के जाल बिछा कर लोगों को जज़्बाती बनाते हुए उनको तसव्वरात की दुनिया में ले जाते हैं। मगर खबर में सिर्फ और सिर्फ मालूमात होती है। अगर हम ख़बर में अपने एहसासात व जज़्बात डाल कर अपनी राय व मश्वरे डालना शुरु कर देंगे तो यह उस ख़बर की सबसे बड़ी कमज़ोरी या नाकामी होगी। इसलिए जब हम ख़बर बनाते हैं तो इस बात का ख़ास ख़्याल रखा जाए कि इसमें किसी क़िस्म की लफ़्फ़ाज़ी न हो। जो ख़बर है, उसको ही पेश किया जाए।

ग्रामर (व्याकरण):-

दुनिया जदीद से जदीदतर होती जा रही है। पुरानी चीज़ों में नई-नई तब्दीलियां रौनुमा हो रही है। जिसकी हमें हिमायत करना चाहिए। मगर कुछ चीज़े ऐसी भी हैं, जो बहुत ही ज़रुरी होती हैं, उनसे दामन नहीं छुड़ाना चाहिए। मिसाल के तौर पर ख़बर का ग्रामर इसका लाज़िमी जुज़ (हिस्सा) होता है। जिस तरह इंसान अंगों के बग़ैर अपाहिज कहलाता है, उसी तरह ग्रामर के बग़ैर ख़बर अपाहिज हो जाती है। हमें चाहिए कि ख़बर बनाते वक़्त कौमा, फुल स्टॉप से लेकर न्यू पैरा तक का ज़्यादा से ज़्यादा ख्याल करना चाहिए। इस मामले में हमें कोई भी सहुलियत नहीं है कि बग़ैर ग्रामर के कोई एक लाईन भी लिख सके।

ख़बर की हेडिंग:-

किसी भी ख़बर की हेडिंग ही पढ़ने वाले को ख़बर पढ़ने के लिए आमादा करती है। या यूं कहे कि किसी ख़बर की हेडिंग वो दरवाज़ा होती है, जिसके ज़रिए पढ़ने वाला ख़बर के अंदर जाता है। अगर हेडिंग कमज़ोर होगी तो पढ़ने वाला ख़बर पढ़ने को राज़ी ही नहीं होगा।

फॉलोअप:-

किसी भी ख़बर का फॉलोअप होना भी बहुत ज़रुरी होता है। एक अहम को एक दिन चलाया जाए तो दूसरे दिन लोग इसका इंतज़ार करते हैं। अगर इसका फॉलोअप न हो तो ये उस ख़बर देने वाले की सबसे बड़ी ख़ामी होती है।                                     अनुवाद:- अफ़रोज़ आलम साहिल 

 


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